जाने कितने ही अरमानों को तबाह किया मैने।
घर के किसी कोने में घड़ी को रो लेती हूं,
नही किसी को हमराज़ किया मैंने।
इतनी समझ कहाँ जो कोई समझे दर्द मेरा
होंठो पर हंसी, आंखों में सैलाब को थाम लिया मैंने।
क्यों किसी को जिम्मेवार कहूँ,
खुद को तनहा खुद आप किया मैंने।