Har bat me khubsurati hoti hai...
Ek khubsurat sa dhokha
maine bhi khaya hai
एक बीज बो दिया है किसी ने,
मेरी ज़मीन पर देखो,
रोज़ पानी भी देता है,
रोज़ माटी की खुदाई भी करता है,
बढ़ जाने दो इसे पेड़ में,
फल जैसे भी हो,
खाने उसे भी होंगे।
मेरे तल्ख़ रुख को बदसलूकी समझता है,
कहने को वो अपना है, क्या खाक़ अपना है।
जिसकी आँखे देखती हो हमे दुसरो की नज़र से,
कहने को वो अपना है, क्या खाक़ अपना है।
जो मेरे अल्फाजो के मायने दुसरो से समझता हो,
कहने को वो अपना है, क्या खाक़ अपना है।