Monday, August 17, 2020

अलसाई  सी आँखों में 

कुछ अलसाए से ख़्वाब पड़े।

कुछ धूप में तपते हैं

कुछ शाम संग भीग जाते हैं।

कुछ  बैठ मुंडेर पर ताकते है,

हर दिन एक उम्मीद नई

हर रंग देख लिए मैंने

इस बेमानी दुनिया मे,

रात तो काली ही होती है,

पर सुबह भी बेरंग होती है।।



बीज

 एक बीज बो दिया है किसी ने,

मेरी ज़मीन पर देखो,

रोज़ पानी भी देता है,

रोज़ माटी की खुदाई भी करता है,

बढ़ जाने दो इसे पेड़ में,

फल जैसे भी हो,

खाने उसे भी होंगे।


कहने को वो अपना है, क्या खाक़ अपना है।

 मेरे तल्ख़ रुख को बदसलूकी समझता है,

कहने को वो अपना है, क्या खाक़ अपना है।


जिसकी आँखे देखती हो हमे दुसरो की नज़र से,

कहने को वो अपना है, क्या खाक़ अपना है।


 जो मेरे अल्फाजो के मायने दुसरो से समझता हो,

कहने को वो अपना है, क्या खाक़ अपना है।